रिपोर्टर आकाश कुमार 

जनपद अलीगढ़, 23 अगस्त, जनपद की ऐतिहासिक शाही जामा मस्जिद में सिटिजन सोसायटी और जामा मस्जिद कमेटी के संयुक्त तत्वावधान में 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के शहीदों को श्रद्धांजलि अर्पित की गई। कार्यक्रम में अलीगढ़ के एसएसपी नीरज कुमार जादौन मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए, जबकि अध्यक्षता पूर्व महापौर मोहम्मद फुरकान ने की। कार्यक्रम में शहर और अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय से जुड़े लोगों ने बड़ी संख्या में भाग लिया। 23 अगस्त को आयोजित इस कार्यक्रम में मौलाना अब्दुल जलील समेत 73 शहीदों को श्रद्धासुमन अर्पित किए गए।

कार्यक्रम का संचालन डॉक्टर आरिफ अली खान ने किया। हाफिज अकील की तिलावत-ए-कलाम पाक से कार्यक्रम की शुरुआत हुई। इसके बाद एसएसपी नीरज कुमार जादौन, पूर्व महापौर मोहम्मद फुरकान समेत अन्य लोगों ने शहीदों की कब्रों पर गुलपोशी कर उन्हें श्रद्धांजलि दी।

इस अवसर पर एएमयू के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉक्टर राहत अबरार, एएमयू की शिक्षिका डॉक्टर रेहान अख्तर कासमी और शाही जामा मस्जिद के इमाम हजरत मौलाना मुफ्ती महमूदुल हसन कासमी ने अपने विचार रखे। कार्यक्रम के संयोजक और शाही जामा मस्जिद के सचिव मोहम्मद अहमद शेवान ने अतिथियों और उपस्थित लोगों का आभार व्यक्त किया।

इस दौरान एसएसपी नीरज कुमार जादौन ने कहा कि उनके लिए यह गौरव और सौभाग्य की बात है कि उन्हें शाही जामा मस्जिद में 1857 के शहीदों को श्रद्धांजलि देने का अवसर मिला। उन्होंने कहा कि यहां आकर उन्हें 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में अलीगढ़ के 73 लोगों की भागीदारी और उनकी शहादत के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली।

एएमयू के पूर्व जनसंपर्क अधिकारी डॉक्टर राहत अबरार ने 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में उलेमा की भूमिका और हिंदू-मुस्लिम एकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि आजादी की लड़ाई में उलेमा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने कहा कि 1857 में हिंदू, मुस्लिम और विभिन्न वर्गों के लोगों ने मिलकर अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ संघर्ष किया और साझा रूप से कुर्बानियां दीं। उन्हीं बलिदानों के परिणामस्वरूप आज हम आजादी की फिजा में सांस ले रहे हैं।

शाही जामा मस्जिद के इमाम हजरत मौलाना मुफ्ती महमूदुल हसन कासमी ने 1857 की जंग-ए-आजादी में उलेमा के योगदान पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उलेमा ने उस दौर में लोगों को जागरूक करने, जुल्म और विदेशी शासन के खिलाफ आवाज बुलंद करने तथा जनता को एकजुट करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मौलाना अब्दुल जलील और उनके साथियों की शहादत इसका महत्वपूर्ण उदाहरण दिया।

उन्होंने कहा कि शहीदों को याद करना अपनी तारीख और जिम्मेदारी को याद करना है। नई पीढ़ी को इन कुर्बानियों से परिचित कराना जरूरी है, ताकि वह आजादी की कीमत, राष्ट्रीय एकता और आपसी भाईचारे के महत्व को समझ सके।

एएमयू की शिक्षिका डॉक्टर रेहान अख्तर कासमी ने कहा कि आज जरूरत इस बात की है कि 1857 के इन शहीदों को याद किया जाए और नई पीढ़ी को भी उनके योगदान और बलिदान से परिचित कराया जाए। उन्होंने कहा कि इन ऐतिहासिक किरदारों को केवल किताबों तक सीमित नहीं रखा जाना चाहिए, बल्कि युवाओं को बताया जाना चाहिए कि आजादी की लड़ाई में अलीगढ़ के लोगों ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और देश के लिए अपने प्राण न्योछावर किए।

अध्यक्षता भाषण देते हुए पूर्व महापौर मोहम्मद फुरकान ने कहा कि यह बेहद महत्वपूर्ण दिन है। उन्होंने एसएसपी नीरज कुमार जादौन की मौजूदगी और शहीदों को श्रद्धांजलि दिए जाने को सराहनीय बताया। उन्होंने कहा कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य यही है कि शहर में भाईचारा और आपसी एकता कायम रहे तथा आजादी के उन मतवालों को हमेशा याद रखा जाए, जिन्होंने देश के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी। इस मौके पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी और शहर के लोग उपस्थित रहे बड़ी संख्या में।

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